मध्य प्रदेश

अतिथी शिक्षकों के साथ कठपुतली का खेल खेलती प्रदेश सरकार

गंजबासौदा
विगत दस वर्षों से म.प्र. के शिक्षा विभाग के गिरते शिक्षा के स्तर और चालीस से पचास हजार तक की मोटी तनख्वाह लेने वाले कुछ शिक्षकों और विभाग में शिक्षकों की कमी को दूर कर शिक्षण कार्य की मुख्य धुरी बने अतिथि शिक्षकों को अब अपना जीवन अंधकार में लगने लगा है। अपनी उम्र के तीसरे पड़ाव पार कर चुके कुछ अतिथी शिक्षकों के साथ साथ अन्य सभी अतिथी शिक्षकों के मन में बस अब मायूसी और हताशा साफ देखी जा सकती है।

वहीं अतिथी शिक्षकों को स्थाई करने के लिये बार बार बस बात उठाई जा रही है लेकिन इस पर अमल नहीं हो पा रहा है। नित नई योजनाओं की चक्की में पिस रहे यह अतिथी शिक्षकों को अब शासन की नियत पर शक होने लगा है। कि वह केवल वोट बैंक की राजनीति चमकाने मंचों से घोषणाएं करते हैं और चुनाव निकलते ही घोषणाएं हवा हवाई हो जाती हैं। लंबे समय से अध्यापन कार्य करा रहे अतिथी शिक्षक खासतौर से महिला वर्ग के सामने सबसे अधिक समस्या बनी हुई है। उनका कहना है कि हम बड़ी ही ईमानदारी के साथ पूरे समय शिक्षण कार्य कराते हैं लेकिन पढ़े लिखे होने के साथ साथ डिप्लोमा प्राप्त हम अतिथी शिक्षकों को एक अशिक्षित मजदूर से भी कम वेतन दिया जा रहा है हम इतने ही वेतन में ही खुश हैं लेकिन हमें स्थाई किया जाये।  

शासन की दोहरी नीतियों की चक्कियों में पिस रहे इन युवक युवतियां जो विगत पांच से आठ वर्षों से लगातार शिक्षण कार्य करा रहे हैं उनको नित नई योजनाओं के नाम पर न तो स्थाई किया जा रहा है और इस मंहगाई के समय में 100 से 150 रुपए के साथ साथ स्कूलों में स्थाई रूप से पदस्थ शिक्षकों का कार्य भी हम से करवाया जाता है। देहाड़ी मजदूरों से भी कम मिलने वाले इस वेतन पर इतनी मंहगाई के दौर में खर्च उठाना संभव नहीं हो पा रहा है। वहीं शासन की नवीन नीति में भी इन अतिथी शिक्षकों की भावनाओं के साथ जमकर खिलवाड़ किया जा रहा है।

लंबे समय से शिक्षा विभाग की डूबती नैया के खेबनहार के रूप में वरदान बनकर आये अतिथी शिक्षकों के साथ म.प्र. शासन द्वारा दोहरी  मापदण्ड अपनाये जा रहे हैं जहां एक ओर स्थाई करने की बात विगत वर्षों में घोषणाएं तो की गई लेकिन  आज तक अमलोजाम नहीं पहनाया गया । बिना वेतन लिये अपने कर्त्तव्य को पूरी ईमानदारी के साथ ये शिक्षा के प्रहरी अपना कार्य करते चले आ रहे हैं। लेकिन प्रदेश सरकार मानव अधिकारों का हनन करते हुए किसी बंधुआ मजदूर की तरह इन से कार्य करवा रही है। विगत चार माह से अधिक समय बीत जाने के बाद भी बिना वेतन के कार्य कर रहे इन अतिथी शिक्षकों के सामने इन दिनों आर्थिक तंगी के चलते साथ ही अन्य कोई कार्य नहीं कर पाने से यह अपना धैर्य खोते हुए आत्महत्या करने जैसे कदम उठाने को मजबूर हैं।

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