राजनीति

प्रमोशन में आरक्षण पर SC के फैसले पर बोली सरकार, हम पार्टी नहीं, कर रहे हैं बड़ी चर्चा

नई दिल्ली

प्रमोशन में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सरकार चौतरफा हमले झेल रही है। जिस तरह विपक्ष ने सरकार को घेरा है, उससे सरकार बैकफुट पर दिख रही है। इस बीच, सरकार ने शीर्ष अदालत के फैसले से सफाई पेश करते हुए कहा कि इस केस में वह पार्टी नहीं थी और केंद्र मसले पर बड़ी चर्चा कर रही है। कांग्रेस से लेकर एनडीए के सहयोगी दल भी शीर्ष अदालत के इस फैसले पर ऐतराज जता चुका है और संसद में आरक्षण को लेकर कानून में बदलाव की मांग कर चुके हैं।सरकार बोली, हम इस केस में पार्टी नहीं केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता थावरचंद गहलोत ने लोकसभा में दिए बयान में साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के जिस केस को लेकर फैसला दिया है, उसमें केंद्र सरकार पार्टी नहीं थी।

 

गहलोत बोले, कर रहे हैं बड़ी चर्चा

उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत द्वारा नौकरी में प्रमोशन को मूलभूत अधिकार नहीं बताने के फैसले पर सरकार उच्च स्तरीय चर्चा कर रही है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर हमला बोला और इसे आरक्षण खत्म करने की रणनीति करार दिया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि बीजेपी और आरएसएस की यह आरक्षण खत्म करने की रणनीति है।

 

एलजेपी कर रही है फैसले का विरोध

एनडीए की सहयोगी एलजेपी ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का विरोध किया है। एलजेपी नेता चिराग पासवान ने लोकसभा में कहा कि वह इस फैसले से सहमत नहीं हैं। चिराग पासवान ने कि महात्मा गांधी और बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के बीच पूना पैक्ट का ही परिणाम है कि आरक्षण एक संवैधानिक अधिकार है। आरक्षण खैरात नहीं है, यह संवैधानिक अधिकार है। उनकी लोक जनशक्ति पार्टी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सहमत नहीं है। केंद्र सरकार इस पर हस्तक्षेप करे। आरक्षण से जुड़े सारे कानून को नौवीं सूची में डाला जाए। जिससे आरक्षण पर सवाल उठाने की बहस ही खत्म हो जाए।

 

प्रमोशन में आरक्षण पर SC का यह फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है। किसी का मौलिक अधिकार नहीं है कि वह प्रमोशन में आरक्षण का दावा करे। कोर्ट इसके लिए निर्देश जारी नहीं कर सकता कि राज्य सरकार आरक्षण दे। सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी जजमेंट (मंडल जजमेंट) का हवाला देकर कहा कि अनुच्छेद-16 (4) और अनुच्छेद-16 (4-ए) के तहत प्रावधान है कि राज्य सरकार डेटा एकत्र करेगी और पता लगाएगी कि एससी/एसटी कैटिगरी के लोगों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व है या नहीं ताकि प्रमोशन में आरक्षण दिया जा सके। लेकिन ये डेटा राज्य सरकार द्वारा दिए गए रिजर्वेशन को जस्टिफाई करने के लिए होता है कि पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। लेकिन ये तब जरूरी नहीं है जब राज्य सरकार रिजर्वेशन नहीं दे रही है। राज्य सरकार इसके लिए बाध्य नहीं है। और ऐसे में राज्य सरकार इसके लिए बाध्य नहीं है कि वह पता करे कि पर्याप्त प्रतिनिधित्व है या नहीं। ऐसे में उत्तराखंड हाई कोर्ट का आदेश खारिज किया जाता है और आदेश कानून के खिलाफ है।

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