विश्व

पाकिस्तान की इकलौती राजनीतिक पार्टी जिसके सामने कांप रही है सेना

इस्लामाबाद 
पाकिस्तान शासन में उसकी सेना का सिक्का लंबे वक्त से चलता आया है और उसके सामने सिर उठाने की कोशिश करने वालों को भयानक नतीजों का सामना करना पड़ता है। हालांकि, पिछले महीने पश्तून तहाफुज मूवमेंट (PTM) नेता आरिफ वजीर की हत्या के बाद सेना को खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। देश में PTM इकलौती ऐसी पार्टी है जिसने पाक सेना को खुली चुनौती दे रखी है और आरिफ की हत्या से पैदा हुए आक्रोश के चलते अब यह दिन-ब-दिन और मजबूत होती जा रही है। 

कांप गई थी पाक सेना 
PTM को खैबर पख्तूनख्वा के आदिवासी इलाकों में खासा सपॉर्ट हासिल है। खुद आरिफ का दक्षिण वजीरिस्तान में अच्छा खासा सपॉर्ट बेस था। उनकी हत्या के बाद देश में PTM समर्थक एकजुट हो गए हैं। PTM की स्थापना 2014 में 20 साल के मंजूर पश्तीन ने की थी। साल 2018 में एक पश्तून युवा के एनकाउंटर के विरोध में आंदोलन डेरा इस्माइल खान से इस्लामाबाद लॉन्ग मार्च के लिए निकला और राजनीतिक मंच पर चर्चा बटोर ली। दो हफ्ते राजधानी में किए शांतिपूर्ण प्रदर्शन से सेना तक कांप गई थी। 

यूं जीता राजनीतिक मैदान 
इसके साथ ही PTM ने एक आंदोलन से निकलकर राजनीतिक दल का रूप ले लिया। उस साल संसदीय चुनाव में हिस्सा लिया और दो सीटों पर जीत भी हासिल की। मोहसिन दावर और आरिफ वजीर का कजिन अली वजीर संसद पहुंचे। चुने गए प्रतिनिधि होने के बावजूद सेना ने मीडिया को PTM को कवर करने से इस कदर रोक दिया कि वजीर की मौत का भी कवरेज न के बराबर हुआ। हालांकि, इसका PTM को फायदा ही हुआ क्योंकि पारंपरिक मीडिया की जगह सोशल मीडिया को हथियार बनाने से उसे ज्यादा समर्थन हासिल हुआ। 

इसलिए पाक को है डर 
मशहूर होती पार्टी को सेना ने देश के खिलाफ और देशद्रोही तक बताया। कभी आतंकी कहा तो कभी विदेशी ताकतों का मोहरा। यहां तक कि भारतीय खुफिया एजेंसी RAW तक का नाम घसीट लिया और पूछा कि आखिर PTM को RAW से इस्लामाबाद में प्रदर्शन के लिए कितने पैसे मिले थे। दरअसल, सेना को डर है कि कहीं 1947 में भारत और पाकिस्तान के ब्रिटेन से आजाद होते वक्त जो पश्तून राष्ट्रवाद और पश्तून आजादी आंदोलन डूरंड लाइन के दोनों ओर खड़ा हुआ था, वह दोबोरा सिर न उठा ले। 
 

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