बिहार

नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव का बड़ा सामाजिक आधार, कैसे भाजपा 2024 में पाएगी पार; 2014 का प्रदर्शन चुनौती

नई दिल्ली
 
नीतीश कुमार ने करीब 5 साल की दूसरे राउंड की दोस्ती को तोड़कर एक बार फिर से भाजपा को झटका दिया है। वह आरजेडी के पाले में चले गए हैं और महागठबंधन के सीएम के तौर पर आज शपथ लेने वाले हैं। भाजपा के लिए नीतीश कुमार का पालाबदल कुछ मुश्किलें लेकर आया है तो कुछ मौके भी छिपे हैं। कहा जा रहा है कि भाजपा की सेंट्रल लीडरशिप को काफी समय से अंदाजा हो गया था कि नीतीश कुमार पालाबदल कर सकते हैं, लेकिन उन्हें यह उम्मीद नहीं थी कि ऐसा कुछ ही दिन के अंदर हो जाएगा। 2013 से 2017 के दौर को छोड़ दें तो नीतीश कुमार 1995 के बाद से ही भाजपा के सहयोगी रहे हैं।
 

भाजपा ने नीतीश कुमार को काफी प्रमोट भी किया था और सीएम के तौर पर उन्हें मौका भी दिया था। सालों तक भाजपा बिहार में जूनियर पार्टनर के तौर पर रही थी और सुशील मोदी के साथ मिलकर नीतीश कुमार सर्वेसर्वा के रोल में रहे। लेकिन अब बदले हालातों में भाजपा उनकी पार्टी जेडीयू से कहीं ज्यादा मजबूत है और अब वह अकेले चलने पर भी फोकस कर रही है। कहा जा रहा है कि भाजपा की यह तैयारी भी नीतीश के दर्द को बढ़ा रही थी। भाजपा के नेता भी मानते हैं कि 2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को जब 74 सीटें मिलीं और जेडीयू को 43 ही हाथ लगीं तो नीतीश कुमार को अपना कद घटता मालूम हुआ। वह इस बात से परेशान थे कि कभी जो भाजपा जूनियर पार्टनर थी, अब उसका दमखम राज्य में इतना बढ़ गया है।
 
आरजेडी और जेडीयू का मिलकर बड़ा होगा सामाजिक आधार
अब नीतीश कुमार ने आरजेडी का दामन थाम लिया है तो भाजपा के लिए एक अवसर है कि वह अकेले ही आगे बढ़े। लेकिन उसके सामने एक बड़ी मुश्किल होगी कि कैसे सामाजिक समीकरणों को साधा जाए। दरअसल आरजेडी मुस्लिम और यादव वोटों के साथ एक बड़ा बेस रखती है। नीतीश कुमार का फेस गैर-यादव पिछड़ों को जोड़ने में भाजपा को मदद करता था। अब नीतीश कुमार यदि आरजेडी के साथ हैं तो फिर दोनों दलों का सोशल बेस काफी बड़ा हो जाएगा। ऐसे में भाजपा के आगे चुनौती होगी कि कैसे वह बिहार में सामाजिक समीकरणों को साधती है।
 
बिहार में विकास से बड़ा मुद्दा रहा है सामाजिक न्याय
बिहार की राजनीति बीते करीब तीन दशकों से लगातार सामाजिक न्याय पर आधारित रही है। विकास समेत अन्य तमाम मुद्दों पर सामाजिक न्याय की राजनीति भारी रही है। ऐसे में भाजपा को नीतीश कुमार की गठबंधन से विदाई के बाद एक बार फिर से अपनी रणनीति तैयार करनी होगी। भाजपा ने अपने दम पर चलने के संकेत पहले भी दे दिए थे। हाल ही में पटना में भाजपा की एक मीटिंग हुई थी। इस बैठक में देश भर के 418 नेता जुटे थे और उन्होंने बिहार की 200 विधानसभाओं का दौरा किया था। सिर्फ उन 43 सीटों पर ही भाजपा ने नेता नहीं भेजे, जहां जेडीयू जीती थी।

Related Articles

Back to top button
Close
Close