स्वास्थ्य

इंडियन गर्ल्स में तेजी से बढ़ रहा है डिप्रेशन

हॉर्वर्ड मेडिकल स्कूल की रिपोर्ट बताती है कि भारतीय किशोरियां पिछले एक दशक में तेजी से डिप्रेशन की चपेट में आई हैं। इसका बडा कारण सोशल मीडिया का बढ़ता एक्सपोजर है। एक रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में हर 7 में से एक भारतीय इस समय अवसाद की समस्या से पीड़ित है।

भविष्य के बारे में सोचना एक सामान्य बात है और ऐसा करना भी चाहिए, लेकिन जब हम भविष्य को लेकर अपनी सोच को नियंत्रित नहीं कर पाते हैं और यह बहुत अधिक होने लगती है तब यह चिंता में बदल जाती है। इसके बाद भविष्य की यह चिंता जिसके साथ एंग्जाइटी, सिरदर्द और बदन दर्द के साथ हर छोटी चीज के बारे में आने वाले विचार जब लगातार 6 महीने तक मौजूद रहते हैं तो यह जनरलाइज्ड एंग्जाइटी डिसआर्डर (जीएडी) का रूप लेने लगता है, लेकिन यह डिप्रेशन नहीं है।

डिप्रेशन और जीएडी के बीच अंतर होता है। डिप्रेशन में व्यक्ति ज्यादातर समय कम से कम 2 सप्ताह तक उदास महसूस करता है। अवसाद से ग्रस्त व्यक्ति अतीत में किए गए कामों को लेकर चिंतित रहता है। पूर्व में किए गए गलत कामों के लिए खुद को दोषी मानता है। मुख्य रूप से उसका ध्यान नकारात्मक चीजों पर केंद्रित रहता है। डिप्रेशन एक मूड डिसआर्डर है। इसमें व्यक्ति मुख्य से उदास या कुछ मामलों में चिड़चिड़ा रहता है। लगातार खराब मूड के कारण व्यक्ति सामान्य दिनों की तुलना में कम ऊजार्वान महसूस करने लगता है। वह उन चीजों में खुशी पाने के लिए संघर्ष करने लगता है, जिनमें वह पहले आनंद लेता था। आत्मविश्वास और एकाग्रता में प्रमुखता से कमी आने लगती है। स्वयं के बारे में नकारात्मक विचार, कम नींद, भूख और एंग्जाइटी अवसाद के सामान्य लक्षण हैं। कई बार लोगों को अवसाद में अधिक नींद या अधिक भूख का अनुभव होता है। इसे कम्फर्ट ईटिंग कहते हैं। यह भी अवसाद का एक लक्षण है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उपरोक्त लक्षण कम से कम 2 महीने तक रहने चाहिए। कुछ दिनों के लिए नींद और भूख का कम या ज्यादा होना आम बात है। ऐसा तनाव या एंग्जाइटी के कारण भी हो सकता है। नींद और भूख में काफी बदलाव आता है। वह स्वयं और भविष्य के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण रखने लगता है, जैसे कि किसी व्यक्ति के काला चश्मा पहनने के बाद सब कुछ काला और नजर आने लगता है। निराशा के गंभीर मामलों में व्यक्ति के मन में आत्महत्या करने के विचार आ सकते हैं क्योंकि उसे लगता है कि कोई आशा नहीं बची है। डिप्रेशन की पहचान किसी ब्लड या रेडियोलॉजिकल टेस्ट से नहीं की जा सकती।

इसे केवल क्लीनिकल परीक्षण से ही जाना जा सकता है। अवसाद कई कारकों से हो सकता है। गले में पाई जाने वाली थायरॉयड ग्रंथि की असामान्यता से हाइपोथायरायडिज्म के कारण भी डिप्रेशन हो सकता है। इसमें थायराइड का स्तर कम हो जाता है जिससे अवसाद का अनुभव होना आम है। इसलिए जब आपको अवसाद का अनुभव हो तो थायरॉयड ग्रंथि की शिथिलता की पहचान के लिए टीएफटी (थायरॉइड फंक्शन टेस्ट) करा सकते हैं। विटामिन बी 12 की कमी (शाकाहारियों में बहुत आम) से भी अवसाद हो सकता है। इसलिए इसका टेस्ट भी कराया जा सकता है।  यह अवसाद से उबरने वाले रोगियों में देखी जाने वाली एक बहुत ही सामान्य समस्या है। इसके कई कारण हो सकते हैं। सबसे पहले यह स्पष्ट कर दें कि यदि यह ओवर थिंकिंग भविष्य को लेकर है और भविष्य में होने वाली चीजों के परिणामों के बारे में नकारात्मक विचार आ रहे हैं तो यह जनरलाइज्ड एंग्जाइटी डिसआॅर्डर (जीएडी) का संकेत है जो अवसाद से अलग है। अवसाद और जीएडी दोनों ही एक साथ हो सकते हैं, लेकिन दोनों का उपचार अलग-अलग है। यदि व्यक्ति अपने और अपने कार्यों के बारे में नकारात्मक विचार रखता है तो यह अवसाद को सकता है। एक और बात जिस पर मैं जोर देना चाहता हूं कि अवसाद संभवत: केमिकल डिसबैलैंस के कारण होता है और यह व्यक्ति के व्यक्तित्व या आंतरिक शक्ति का रिफलेक्शन नहीं है। डिप्रेशन किसी में भी हो सकता है। कभी-कभी अवसाद से उबरने वाले मरीज खुद को दोष देते हैं। इससे उनका आत्मविश्वास कमजोर हो जाता है, जिससे निगेटिविटी बढ़ती है। इसलिए उन्हें यह समझने की आवश्यकता है कि वे खुद को अवसाद के लिए दोषी न ठकराएं। यह किसी की कमजोरी का प्रतिबिंब नहीं है।

Related Articles

Back to top button
Close
Close