मध्य प्रदेश

काशी की प्रसिद्ध कचौड़ी-पूरी का स्वाद लेते दिखे सीएम मोहन यादव, सादगी ने जीता लोगों का दिल

भोपाल 

मुख्यमंत्री मोहन यादव अपने वाराणसी दौरे के दौरान एक अलग अंदाज में नजर आए। उन्होंने यहां के मशहूर स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लिया, जिसकी तस्वीरें अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। एयरपोर्ट जाते समय सीएम का काफिला अचानक मिंट हाउस स्थित श्रीराम भंडार पर रुक गया। यहां उन्होंने बनारस की प्रसिद्ध कचौड़ी, पूरी-राम भाजी और जलेबी का आनंद लिया।

बता दें मुख्यमंत्री  मोहन यादव का काफिला जब वाराणसी में एयरपोर्ट की ओर जा रहा था, तभी वे मिंट हाउस स्थित श्रीराम भंडार पर अचानक रुक गए। यहां उन्होंने बनारस की मशहूर कचौड़ी, पूरी-राम भाजी और जलेबी का स्वाद लिया। इस दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत के हर प्रांत और शहर की अपनी विशिष्ट खान-पान संस्कृति होती है, जो वहां की पहचान को दर्शाती है। स्थानीय स्वाद और पारंपरिक व्यंजन हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
 
लोगों के बीच सहज सीएम डॉ. यादव
मुख्यमंत्री के इस सहज और सरल व्यवहार ने आम लोगों का दिल जीत लिया। स्थानीय लोगों ने भी उनसे मुलाकात कर खुशी जाहिर की और उनके इस अंदाज की सराहना की। कई लोगों ने उनसे संवाद भी किया। लोगों का कहना था कि डॉ. मोहन यादव से मिलकर ये लगा ही नहीं कि वे किसी मुख्यमंत्री से बात कर रहे हैं। 

मेरा सौभाग्य है कि बाबा ने 7 दिन में 2 बार बुलाया
सीएम मोहन यादव ने कहा- बाबा विश्वनाथ की कृपा से उन्हें 7 दिन में 2 बार काशी आने का अवसर मिला। यह मेरा सौभाग्य है। शहर में आध्यात्मिक ऊर्जा है। सीएम ने काशी में आयोजित विक्रमादित्य पर आधारित महानाट्य की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्तुति बेहद अद्भुत है और जो भी काशी आए, वह इसे जरूर देखे।

3 अप्रैल को विक्रमोत्सव 2026 के महानाट्य मंचन का शुभारंभ किया
3 अप्रैल को सीएम योगी और मध्य प्रदेश सीएम मोहन यादव ने विक्रमोत्सव 2026 के महानाट्य मंचन का शुभारंभ किया। इस दौरान सीएम मोहन यादव ने योगी को वैदिक घड़ी भी भेंट की। मध्यप्रदेश के सीएम मोहन यादव ने कहा- मुख्यमंत्री योगीजी ने जो कहा, वह काफी महत्वपूर्ण है। 3 भाइयों की जोड़ी जगत में विख्यात है। भाइयों के बीच कैसा संबंध होना चाहिए, इसका उदाहरण भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी की जोड़ी से मिलता है। उसी प्रकार भर्तृहरि और महाराज विक्रमादित्य की जोड़ी भी उतनी ही प्रसिद्ध है।

विक्रमादित्य की परंपरा में महाराज भर्तृहरि नाथ संप्रदाय में प्रतिष्ठित हुए। उनकी दीक्षा की भूमि उज्जैन थी। उनकी साधना की भूमि काशी के निकट चुनार का किला था। कहा जाता है कि चुनार किले का निर्माण भी महाराज भर्तृहरि के नाम से जुड़ा है।

जब इस नाट्य रूपांतरण की प्रस्तुति का प्रस्ताव मध्यप्रदेश सरकार के समक्ष आया, तो मेरा पहला सुझाव था कि इसका आयोजन काशी में किया जाए।

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