बिहार

रांची के आसमान में दिखा अद्भुत खगोलीय नजारा: चांद और शुक्र की नजदीकी ने खींचा लोगों का ध्यान

रांची
सोमवार की रात भारत के कई शहरों, विशेषकर रांची के आसमान में एक बेहद शानदार और अद्भुत खगोलीय नजारा देखने को मिला।

सूर्यास्त के बाद पश्चिमी आसमान की ओर एक पतला अर्द्धचंद्र दिखाई दिया, जिसके ठीक पास तेज चमकता हुआ शुक्र ग्रह नजर आ रहा था।

चांद और शुक्र की इस दुर्लभ नजदीकी ने शहरवासियों और खगोल विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

यह नजारा सूर्यास्त के तुरंत बाद कुछ सीमित समय के लिए ही दिखा, क्योंकि थोड़ी देर बाद दोनों क्षितिज के नीचे ओझल हो गए।

क्या है 'अर्थशाइन' और 'आकल्टेशन'?
इस खूबसूरत घटनाक्रम के दौरान चंद्रमा को ध्यान से देखने पर उसके अंधेरे हिस्से पर हल्की चमक भी दिखाई दे रही थी, जिसे खगोल विज्ञान की भाषा में 'अर्थशाइन' कहा जाता है।

यह चमक वास्तव में पृथ्वी से परावर्तित होकर चंद्रमा तक पहुंचने वाली सूर्य की रोशनी है, जो चंद्रमा के अंधेरे हिस्से को हल्का रोशन करती है। साफ आसमान होने के कारण यह नजारा बिना दूरबीन के भी स्पष्ट देखा गया।

इस खगोलीय घटनाक्रम के अगले चरण में कुछ क्षेत्रों से चंद्रमा शुक्र ग्रह को कुछ समय के लिए ढकता हुआ भी दिखाई दिया। इस प्रक्रिया को आकल्टेशन (Occultation) कहा जाता है।

हालांकि, यह घटना हर स्थान से समान रूप से दिखाई नहीं देती, लेकिन सूर्यास्त के तुरंत बाद पश्चिमी क्षितिज की ओर नजर डालने वालों ने इस अद्भुत दृश्य का आनंद लिया।

शहरवासियों में दिखा उत्साह
इस खगोलीय घटना को लेकर रांची के लोगों में भारी उत्सुकता देखने को मिली। कई लोगों ने इस दुर्लभ दृश्य की खूबसूरत तस्वीरें अपने मोबाइल और कैमरे में कैद कीं और उन्हें इंटरनेट व सोशल मीडिया अकाउंट्स पर साझा किया।

यह केवल दृष्टि-रेखा (Line of Sight) का प्रभाव है
पर्यावरणविद नीतीश प्रियदर्शी ने बताया कि आसमान में चांद और शुक्र भले ही एक-दूसरे के बेहद करीब दिखाई दिए, लेकिन वास्तविकता में दोनों के बीच की दूरी बहुत विशाल है

चंद्रमा पृथ्वी से लगभग 3.8 लाख किलोमीटर दूर है, जबकि शुक्र ग्रह करोड़ों किलोमीटर दूर है। इसे खगोल विज्ञान में 'मून-वीनस कंजंक्शन' कहा जाता है।

संयोगवश यह नजारा सोमवार को स्पष्ट रूप से दिखाई दिया, जिसे कई लोग एक आध्यात्मिक घटना भी मानते हैं, हालांकि यह पूरी तरह से एक खगोलीय घटनाक्रम है।

किसी ज्योतिषीय प्रभाव का संकेत नहीं
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (DSPMU), रांची के प्राध्यापक डॉ. अभय कृष्ण सिंह ने कहा कि 14 सितंबर का यह आकाशीय संयोजन खगोलीय दृष्टि से बेहद विशेष है।

इसे 'चंद्र-शुक्र युति' कहा जाता है। कुछ क्षेत्रों में चंद्रमा ने शुक्र को ढक लिया, जिसे चंद्र-अवच्छादन (आकल्टेशन) कहते हैं। इसका महत्व किसी ग्रह के पृथ्वी पर प्रभाव में नहीं, बल्कि कक्षीय गति और सापेक्ष स्थिति में है।

डॉ. सिंह ने स्पष्ट किया कि यह घटना किसी ज्योतिषीय प्रभाव का संकेत नहीं है, बल्कि सूर्य, पृथ्वी, चंद्रमा और शुक्र की नियमित कक्षीय गतियों का एक स्वाभाविक परिणाम है।

आने वाले दिनों में भी शुक्र ग्रह शाम के आसमान का प्रमुख आकर्षण बना रहेगा। 18 सितंबर को शुक्र इस दर्शन-चक्र में अपनी अधिकतम चमक के बेहद करीब पहुंचेगा।

 

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