मध्य प्रदेश

दर्द को दिल में समेटे दुआएं बांटते किन्नर

अमिताभ पाण्डेय
 भोपाल । ( अपनी खबर )

किन्नर  !  यह नाम सुनते ही हमारे मन में एक ऐसे समुदाय की तस्वीर उभरती है जो ढोलक की थाप पर नाचते गाते पूरे उत्साह के साथ शादी विवाह या बच्चों के जन्म के मौके पर हमारे घर के दरवाजे पर खूब उन्मुक्त होकर डांस करते हैं ।
उसके बाद मुंह मांगा इनाम मांगते हैं ।इनाम की राशि मिलने के बाद दुआओं के लिए अपने हाथ उठाकर आशीर्वाद देते हुए चले जाते हैं ।किन्नरों की गिनती हमारे समाज में न पुरुषों में की जाती है और ना ही महिलाओं में।

 यह हमारे समाज का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है लेकिन अपमान और उपेक्षा का शिकार है। किन्नरों की गिनती शासन के प्रयास से थर्ड जेंडर के रूप में होने लगी या अच्छी पहल है। किन्नर हमारे समाज का ऐसा हिस्सा है जिसके बारे में लोग बात नहीं करना चाहते ।समाज की उपेक्षा ने किन्नरों को अपमानित उपेक्षित और दर्द भरा जीवन जीने पर मजबूर कर दिया है । उनके जीवन में शोषण की अंतहीन कहानियां भी छिपी है। शोषण ऐसा जिसको ना बोल सकते हैं , ना बता सकते हैं ।शायद आपको यकीन ना हो कि हमेशा नाचते गाते खूब सजे संवरे इन किन्नरों को देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि उनकी निजी जिंदगी बहुत परेशानियों से भरी है।

 भोपाल में किन्नरों के मुख्यतः दो समूह हैं इनमें से एक समूह की गोरी सुरैया नामक किन्नर है जो कि उम्र दराज हो चुकी हैं । वे  अब अपने डेरे ( घर ) पर ही रहती हैं।
 उनके चेले शादी ब्याह और बच्चों के जन्म पर नाचने गाने जाकर इनाम की राशि बटोर कर लाते हैं उनके उनके साथ रहने वाले सभी किन्नर मिल बांट कर  कर खाते पीते हैं । वे इसी तरह अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं। सुरैया के अनुसार किन्नरों का जीवन आसान नहीं है। वे कहती हैं कि मालिक किसी को किन्नर ना बनाएं।

 किन्नरों की जिंदगी बड़ी शोषण और अन्याय से भरी है ।आम आदमी से लेकर गुंडे बदमाश और कई बार तो कुछ पुलिस वाले भी उनका शोषण करते हैं । कोई हफ्ता वसूली करता है तो कोई उनका शारीरिक शोषण करना चाहता है।  सुरैया के मुताबिक किन्नरों की दुनिया बड़ी दुख और परेशानियों से भरी है । उनके बारे में लोग हंसी उड़ाते हैं। उनके बारे में जानना समझना चाहते हैं ।जब किन्नरों को  मदद की जरूरत होती  है तो लोग अक्सर मुंह फेर लेते हैं ।यहां यह बताना जरूरी होगा कि भोपाल शहर में भी किन्नर आजादी के पहले से रहते आए हैं।
 जब भोपाल में नवाबों का दौर हुआ करता था , नवाबों का शासन था ।

उन दिनों किन्नर शाही महल में ही बेगमों की सेवा करने के लिए नौकर के रूप में लगे रहते थे। इतिहासकार मोइन अख्तर खान के मुताबिक बेगमों के  कक्ष में जाने की इजाजत केवल किन्नरों को ही हुआ करती थी क्योंकि किन्नर नामर्द होते थे । वे बेगमों की खिदमत करते थे।

नवाबी दौर में   बेगमों के कक्ष में किसी मर्द को जाने की इजाजत कभी नहीं दी गई ।
केवल बेगमों के कक्ष में या तो उनके शौहर नवाब साहब जा सकते थे या फिर किन्नर जो कि उनकी खिदमत में लगे रहते थे । किन्नरों को नवाबी दौर में पूरा संरक्षण मिला ।उनके खाने पीने रहने का प्रबंध नवाब की ओर से किया जाता था। आजादी के बाद जब राजे रजवाड़े , नवाबी दौर खत्म हो गया तो किन्नरों के सामने रोजी-रोटी का संकट हो गया। किन्नरों ने फिर घर-घर जाकर बच्चों के जन्म उत्सव,  शादी ब्याह  में बधाइयां गाने का काम शुरू किया।

 इससे खुश होकर लोग उन्हें इनाम देने लगे और उनका खाने पीने का इंतजाम हो पाया।   इसके बाद किन्नरों ने धीरे-धीरे रेलगाड़ी , बसों में भी यात्रियों के बीच नाच गाकर इनाम के तौर पर पैसे लेना शुरू किए ।यह भी उनके लिए रोजी-रोटी कमाने का जरिया बन गया ।यहां यह बताना जरूरी है कि जिंदगी भर अपना दुख भूलकर दुआएं बांटते ,  नाचते गाते  भी किन्नरों की जिंदगी में कहीं आराम नहीं है। किन्नर सुरैया की माने तो  किन्नर होना इस दुनिया में, हमारे  समाज में बड़ा अभिशाप है ।

 सुरैया का कहना है कि सरकार को किन्नरों के कल्याण के लिए अधिक अच्छी योजनाएं बनाना चाहिए । किन्नरों के लिए वृद्ध हो जाने पर जिंदगी गुजारना अधिक कठिन हो जाता है। ऐसे में हम मांग करते हैं कि किन्नरों को भी पेंशन के तौर पर ऐसा गुजारा भत्ता दिया जाए जिससे वह अपने बुढ़ापे की जिंदगी को बिना किसी की मदद के आसानी से गुजार सकें।

उल्लेखनीय है कि भोपाल में हर साल सावन माह में रिमझिम बारिश के बीच भुजारिया का त्योहार मनाया जाता है जिसमें सजे संवरे किन्नर अपनी पूरी टीम के साथ शामिल होते हैं। किन्नरों का यह जुलूस जब शहर की सड़कों पर निकलता है तो नजारा देखने लायक होता है। किन्नर नाचते गाते अपनी अदाओं से राह चलते लोगों को दीवाना बना देते हैं।

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