करवा चौथ 2026: आज पूजा का शुभ मुहूर्त कब से कब तक? जानें चंद्रोदय का समय

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आज देशभर स्त्रियां पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए करवा चौथ का व्रत रख रही हैं. यह व्रत सुबह सूर्योदय से पहले सरगी खाने से लेकर रात को चंद्रमा को अर्घ्य देने तक चलता है. इस बीच महिलाएं कई खास तरह की रस्में निभाती हैं. करवा चौथ की कथा सुनती हैं. फिर शाम के समय महिलाएं चंद्र दर्शन के बाद पति के हाथ से पानी पीकर यह व्रत खोलती हैं. हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार करवा चौथ पर दिनभर चार शुभ मुहूर्त रहने वाले हैं. आइए जानते हैं.

करवा चौथ 2026 शुभ मुहूर्त
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:42 बजे से दोपहर 12:27 बजे तक
विजय मुहूर्त: दोपहर 1:56 बजे से 2:40 बजे तक
करवा चौथ पूजा मुहूर्त: शाम 5:38 बजे से 6:56 बजे तक
निशीता मुहूर्त- रात 11 बजकर मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक

करवा चौथ पर चांद कितने बजे निकलेगा?
करवा चौथ के दिन चंद्रमा के दर्शन का इंतजार व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए खास होता है. 29 अक्टूबर को चंद्रोदय रात 8 बजकर 17 मिनट पर हो सकता है. हालांकि, चंद्रमा दिखाई देने का समय हर शहर में एक जैसा नहीं होता. स्थान के अनुसार चंद्रोदय में अंतर हो सकता है. इसलिए व्रत रखने वाली महिलाएं अपने शहर के स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि कर सकती हैं.

करवा चौथ की पूजा कैसे करें?
1. सरगी से करें दिन की शुरुआत: व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह सूर्योदय से पहले उठकर अपनी परंपरा के अनुसार सरगी ग्रहण करती हैं. इसके बाद व्रत रखने का संकल्प लिया जाता है.

2. दिनभर व्रत का पालन करें: परंपरा के मुताबिक, महिलाएं पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं. शाम को स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें और पूजा के लिए आवश्यक सामग्री तैयार करें.

3. देवी-देवताओं का पूजन करें: पूजा के समय भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और करवा माता की आराधना करें. दीपक जलाकर फूल, अक्षत, सिंदूर और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें.

4. करवा चौथ की कथा सुनें: पूजा के दौरान व्रत कथा सुनने या पढ़ने की परंपरा है. इसके बाद विधि-विधान से पूजा पूरी करें.

5. चंद्रमा को अर्घ्य देकर खोलें व्रत: रात में चंद्रमा के दर्शन होने पर उन्हें अर्घ्य दें. इसके बाद प्रचलित परंपरा के अनुसार छलनी से पहले चंद्रमा और फिर पति का चेहरा देखकर जल ग्रहण करें और व्रत का पारण करें.

करवा चौथ की कथा
करवा चौथ से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी. बेटी का नाम वीरवती था. सातों भाई अपनी बहन से बहुत स्नेह करते थे. उनकी आदत थी कि वे पहले बहन को भोजन कराते और फिर खुद खाना खाते थे.

एक बार वीरवती अपने मायके आई हुई थी. शाम को जब उसके भाई काम से लौटे, तो उन्होंने बहन को भूख और प्यास से व्याकुल देखा. भाइयों ने उसे भोजन करने के लिए कहा, लेकिन वीरवती ने बताया कि उसने करवा चौथ का निर्जला व्रत रखा है. वह चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही कुछ खाएगी. चांद के निकलने में देरी होने के कारण उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी.

बहन की यह हालत देखकर भाइयों को दुख हुआ. वे उससे भूख बर्दाश्त करते नहीं देख सके. उन्होंने पीपल के पेड़ के पीछे रोशनी की व्यवस्था करके ऐसा आभास कराया, जैसे आसमान में चंद्रमा निकल आया हो. वीरवती ने उस रोशनी को चांद समझ लिया. उसने चंद्रमा को अर्घ्य देने की रस्म पूरी की और भोजन कर लिया.

कथा में आगे बताया जाता है कि व्रत के नियम का इस तरह पालन करने के बाद वीरवती के पति अचानक अदृश्य हो गए. अपने पति को फिर से पाने की इच्छा से उसने हर महीने चतुर्थी के दिन व्रत करना शुरू कर दिया. इस तरह उसने लगातार 12 महीने तक श्रद्धापूर्वक व्रत किया.

अगले वर्ष करवा चौथ आने पर वीरवती ने पूरे विधि-विधान और विश्वास के साथ उपवास रखा. मान्यता है कि उसकी श्रद्धा से प्रसन्न होकर उसे अपने पति दोबारा प्राप्त हो गए. करवा चौथ की यह कथा व्रत में श्रद्धा, धैर्य और परंपरागत नियमों का पालन करने के महत्व को दर्शाती है.