गणेश देवी बोले- अतीत से सबक और वर्तमान की समझ के साथ लिखना लेखक का दायित्व
अतीत से सबक और आज की समझ के साथ लिखना लेखक का दायित्व-गणेश देवी
इंदौर में म.प्र.प्रगतिशील लेखक संघ का 14वाँ राज्य सम्मेलन 'उम्मीद से भर दें ये जहान’ घोष वाक्य के साथ संपन्न
भूमंडलीय समकाल, लेखक संगठन की भूमिका, लेखकीय प्रतिरोध एवं प्रतिबद्धता और हाशिए के समाज की चुनौतियों पर मंथन
इंदौर
प्रगतिशील लेखक संघ, मध्य प्रदेश का 14वाँ राज्य सम्मेलन 24 और 25 अक्टूबर को इंदौर में स्टेट प्रेस क्लब के सहयोग से अभिनव कला समाज सभागृह में आयोजित हुआ। सम्मेलन में वैश्वीकरण की चुनौतियों, फ़ासीवाद के बढ़ते खतरों, प्रतिरोध की परंपरा, लेखक संगठनों की वैचारिक प्रतिबद्धता, वंचितों के संघर्षों और हाशिये के समाज की समस्याओं पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ। विभिन्न सत्रों में शामिल शीर्ष साहित्यकारों एवं विचारकों ने समकालीन सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों में साहित्य की भूमिका और लेखकों के दायित्वों पर अपने विचार रखे। सम्मेलन में वरिष्ठ कवि मोहन कुमार डहेरिया (छिंदवाड़ा) को मध्य प्रदेश की राज्य इकाई का अध्यक्ष और कवि अनिल करमेले (भोपाल) को महासचिव चुना गया।
विभिन्न सत्रों के दौरान शेखर मल्लिक (झारखंड) की लैटिन अमरीकी कहानियों की अनुवाद की पुस्तक, सतना इकाई के विजयशंकर चतुर्वेदी की पुस्तक ‘निर्णय का स्थापत्य’, नागौद के एड. रमाकांत मिश्र के ‘सच के कटघरे में खड़ा समय’, अशोकनगर की रामदुलारी शर्मा की भारतीय संस्कृति में लोकसंगीत पर केन्द्रित पुस्तक “डूबते स्वर”, सीधी के सोमेश्वर सिंह के कविता संग्रह ‘चलो कहीं और चलें’, शहडोल के अरुण नामदेव के ‘डाल-डाल गिद्ध’ और अन्य अनेक पुस्तकों का लोकार्पण हुआ।
सम्मेलन की पूर्व संध्या पर 23 अक्टूबर को प्रदेश की विभिन्न इकाइयों से आये प्रतिनिधियों के स्वागत में लोकगायक विक्रम बोर्डिया के गायन समूह ने कबीर के पदों का प्रभावी गायन किया।
कार्यक्रम का उद्घाटन 24 अक्टूबर 2026 की सुबह 10 बजे गांधी हॉल परिसर स्थित अभिनव कला समाज में प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव और पंजाबी के प्रमुख साहित्यकार डॉक्टर सुखदेव सिंह सिरसा द्वारा किया गया। कार्यक्रम स्थल को नाम दिया गया “प्रेमचंद नगर”, जिस स्थान पर कार्यक्रम हो रहे थे, उसे “मुक्तिबोध प्रांगण” का नाम दिया गया। मंच का नामकरण प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे दो प्रमुख दिवंगत कवि-मित्रों के नाम पर “चन्द्रकान्त देवताले-कृष्णकांत निलोसे मंच” किया गया।
इसके पश्चात डॉ. सुखदेव सिंह सिरसा, स्वागताध्यक्ष शैला शिंत्रे, कथाकार जितेंद्र भाटिया (मुंबई), उपन्यासकार रणेंद्र, सुरेश कुमार शर्मा (शहडोल), कवि कुमार अंबुज (भोपाल), सुबोध कुमार श्रीवास्तव (भोपाल), नथमल शर्मा (छत्तीसगढ़), राजेंद्र शर्मा (भोपाल), प्रेमचंद गांधी (राजस्थान), और राकेश वानखेड़े (महाराष्ट्र) सहित अन्य माननीय अतिथियों ने अनंत श्रोत्रिय स्मृति पुस्तक प्रदर्शनी, एस.के. दुबे स्मृति कला दीर्घा और केसरी सिंह चिडार स्मृति कविता पोस्टर प्रदर्शनी का शुभारम्भ किया, जिसमें पंकज दीक्षित, मुकेश बिजौले, अशोक दुबे के साथ ही ग्वालियर से आये युवा चित्रकारों की पेंटिंग्स प्रदर्शित की गई थीं। पुस्तक प्रदर्शनी में ज्ञान-विज्ञान से संबंधित पुस्तकों के प्रकाशक “एकलव्य” प्रकाशन और “आस” प्रकाशन की पुस्तकें प्रदर्शित की गई थीं। महत्त्वपूर्ण पुस्तकों और कविता पोस्टरों के माध्यम से साहित्यिक-सांस्कृतिक परंपरा तथा जनपक्षधर रचनात्मक अभिव्यक्तियों को सामने लाने का रचनात्मक प्रयास था।
पहले दिन का पहला सत्र ‘प्रतिरोध का अतीत और वर्तमान की चुनौतियाँ’ विषय पर केंद्रित रहा। कथाकार, उपन्यासकार और चिंतक जितेंद्र भाटिया ने वैश्वीकरण के दौर में साहित्य की भूमिका, सामाजिक-सांस्कृतिक बदलावों, विस्थापन के दर्द की रोशनी में प्रतिरोध की नयी प्रवृत्तियों पर चर्चा की। प्रसिद्ध उपन्यासकार रणेंद्र ने हाशिये के समाज, विशेषकर आदिवासी समुदायों के संघर्षों और उनके प्रतिरोध की विविध अभिव्यक्तियों पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने लेखकों से इन संघर्षों को पहचानने, वंचित एवं शोषित समुदायों की प्रतिरोधी चेतना को साहित्य में जगह देने और अपने लेखन के ज़रिये प्रभावी हस्तक्षेप करने का आह्वान किया। सुखदेव सिंह सिरसा ने निजी अनुभव साझा करते हुए पंजाबी साहित्य और लोकजीवन की गहन पड़ताल की और प्रतिरोध के पड़ावों को चिह्नित किया। उन्होंने भारत में युवाओं द्वारा चलाये जा रहे आंदोलन में भी लेखकों के शामिल होने की अपील की। सत्र की अध्यक्षता करते हुए कवि-नाट्यकार हरिओम राजोरिया (अशोकनगर) और शैला शिन्त्रे (इंदौर) ने भी अपने विचार रखे। कवि पवन करण (ग्वालियर) ने सत्र का संचालन किया और डॉ. अभय नेमा (इंदौर) ने आभार ज्ञापित किया।
दूसरा सत्र “हाशिये का समाज और साहित्य” पर केन्द्रित था। कवयित्री आरती ने महिला संघर्ष के व्यापक होते दायरे की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि आधी आबादी का सवाल अब केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें अनेक आश्रित और वंचित समूहों के संघर्ष भी जुड़ गए हैं। इस सत्र में कथाकार दिनेश भट्ट (छिंदवाड़ा), असअद अंसारी (मंदसौर), जितेंद्र विसारिया (ग्वालियर) ने अपने विचार व्यक्त किये और अध्यक्षता कवि-पत्रकार नथमल शर्मा, कवि राजेन्द्र शर्मा, सुरेश शर्मा, तथा पी. आर. मलैया (सागर)ने की। वक्ताओं के विचार प्रस्तुति में यह सवाल प्रमुखता से उभरा कि लेखक समाज में गहराते अंतर्विरोधों और वंचित समुदायों के अनुभवों को किस तरह अपने लेखन का हिस्सा बनाएँ। वक्ताओं ने ज़ोर दिया कि साहित्य में हाशिए के समाज का चित्रण केवल सहानुभूति तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसके पीछे मौजूद सामाजिक संबंधों, सत्ता संरचनाओं और असमानताओं की भी पड़ताल होनी चाहिए। इस सत्र का संचालन कवि अनिल करमेले ने किया और आभार जावेद आलम ने व्यक्त किया।
उपस्थित लेखकों ने सद्भावना यात्रा के अंतर्गत शहर में रचनाकारों का जुलूस निकाला, जिसमें “अभिव्यक्ति की आज़ादी ज़िन्दाबाद”, “प्रेमचंद ज़िन्दाबाद”, “सज्जाद ज़हीर, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, भीषम साहनी, बलराज साहनी, राही मासूम रज़ा, कैफ़ी आज़मी, मुल्कराज आनंद, आदि” के ज़िन्दाबाद के नारे सड़कों पर गूँजे। शाम के जनसत्र का विषय था “भूमंडलीय समकाल में लेखकों का हस्तक्षेप”। इस सत्र की शुरुआत प्रख्यात संगीतज्ञ विदुषी अनुप्रिया देवताले के वायलिन वादन से हुई। उनकी प्रस्तुति ने अनिर्वचनीय सांस्कृतिक वातावरण निर्मित किया। उसके पश्चात मुख्य अतिथि प्रख्यात भाषाविद्, साहित्यिक आलोचक एवं गणेश एन. देवी ने प्रतिरोध के ऐतिहासिक संदर्भों को रेखांकित करते हुए भाषाओं और साहित्य में उसकी विविध अभिव्यक्तियों की पड़ताल की।
उन्होंने फ़ासीवाद के बढ़ते खतरे के कुछ नाजुक पहलुओं की ओर ध्यान दिलाया। उनका व्याख्यान श्रोताओं ने इस एकाग्रता से सुना कि गर्मी के बावजूद लोगों ने कूलर बंद कर दिए ताकि शोर न हो। गणेश देवी के व्याख्यान का केंद्रीय निष्कर्ष था कि भारत में पिछले 2600 वर्षों से एक लंबा सांस्कृतिक संघर्ष चला आ रहा है और आज का प्रतिरोध भी उसी ऐतिहासिक सिलसिले की एक कड़ी है। विशिष्ट अतिथियों ने भूमंडलीकरण के दौर में बदलते सामाजिक संबंधों, सांस्कृतिक चुनौतियों और लेखकों की हस्तक्षेपकारी भूमिका पर चर्चा की। इस बात पर जोर दिया गया कि लेखक का दायित्व अपने समय की विसंगतियों को दर्ज करने के साथ-साथ उनके पीछे सक्रिय सामाजिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं को समझना भी है। इस सत्र का संचालन मध्य प्रदेश के कार्यकारी महासचिव और राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी ने किया और आभार इंदौर इकाई के अध्यक्ष ज़ाकिर हुसैन ने व्यक्त किया।
सम्मेलन के दूसरे दिन का आगाज़ ‘लेखक संगठन, विचार और प्रतिबद्धता’ विषय के साथ हुआ। इस सत्र में लेखक संगठनों की वैचारिक भूमिका, साहित्यकारों की सामाजिक प्रतिबद्धता और समकालीन परिस्थितियों में सामूहिक साहित्यिक हस्तक्षेप की जरूरत पर चर्चा हुई। राकेश वानखेड़े, सुधीर सजल (भोपाल), सारिका श्रीवास्तव (इंदौर), शेखर मल्लिक, सत्यम पांडे (जबलपुर), अभिषेक अंशु (भोपाल) ने इस सत्र में अपने विचार व्यक्त किये। अध्यक्ष मंडल की ओर से कुमार अंबुज, शैलेन्द्र शैली, हरनाम सिंह, मोहन कुमार डहेरिया और पवित्र सलालपुरिया (गुना) ने विषय को स्पष्ट किया। सत्र का संचालन शशिभूषण ने किया और आभार विवेक मेहता ने व्यक्त किया। वक्ताओं ने इस सवाल पर विचार किया कि बदलते सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में लेखक संगठन किस तरह अपनी वैचारिक पहचान और सामाजिक प्रतिबद्धता को प्रभावी बनाए रख सकते हैं। साहित्यिक सक्रियता, संगठनात्मक एकजुटता और समाज के प्रति लेखक की जिम्मेदारी इस विमर्श के प्रमुख विषय रहे।
दूसरे दिन दोपहर बाद संगठनात्मक सत्र आयोजित किया गया। संगठन सत्र में सर्वप्रथम प्रगतिशील धारा से जुड़े दिवंगत साहित्यकारों को याद करते हुए दो मिनट का मौन रखा गया। यह सत्र विशेष रूप से प्रगतिशील लेखक संघ की मध्य प्रदेश की इकाइयों के प्रतिनिधियों के लिए था। इस अवसर पर 14वें राज्य सम्मेलन के समक्ष प्रस्तुत प्रस्तावों पर विचार किया गया। निवर्तमान कार्यकारिणी ने नई कार्यकारिणी का प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिस पर अनुमोदन की प्रक्रिया पूरी की गई। संगठन की भावी दिशा, इकाइयों की सक्रियता और आगामी कार्ययोजना से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहे। चुन्नीलाल वाधवानी ने आभार व्यक्त किया।
प्रस्ताव जो पारित हुए
केन बेतवा नदी परियोजना के विस्थापितों के लिए न्याय की मांग का प्रस्ताव विनीत तिवारी ने प्रस्तुत किया, मणिपुर में शांति बहाली के साथ विस्थापितों के पुनर्वास का प्रस्ताव आरती ने, आदिवासियों सहित समाज के वंचित तबको पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ प्रस्ताव सत्यम पांडे ने, शिक्षण व्यवस्था के राजनीतिक दबाव से मुक्त करने का प्रस्ताव असअद अंसारी ने ,सांस्कृतिक राष्ट्रवाद थोपने के विरुद्ध प्रस्ताव शैलेंद्र शैली ने टेलीविजन पर अंधविश्वास फैलाने वाले कार्यक्रमों के विरुद्ध प्रस्ताव दिनेश भट्ट ने, एस आई आर विरोधी आंदोलन के दमन के खिलाफ प्रस्ताव गिरीश पटेल ने तथा डमी स्कूलों के खिलाफ प्रस्ताव शशि भूषण ने प्रस्तुत किया। सभी प्रस्तावों का अनुमोदन सदन सदन में किया गया।
ईरान की जनता पर अमेरिकी साम्राज्यवादी द्वारा थोपे का युद्ध एवं फिलिस्तीन में इजरायल द्वारा किए गए नरसंहार की भी सदन में निंदा की गई।
समापन सत्र में ईरानी न्यू वेव सिनेमा आंदोलन के शिल्पकार अब्बास कियारोस्तमी की बेहद संवेदनशील फिल्म ‘Where is the friend’s house? (दोस्त का घर कहाँ है?)’ प्रदर्शित की गई।
फिलिस्तीन के सपनों की थीम पर विनीत तिवारी और आसिम द्वारा बनाया गया ज़ैतून का रंगीन वृक्ष और पक्षी आगंतुकों के लिए एक सेल्फी प्वाइंट बन गया।
दो दिनों के इस आयोजन में साहित्य, समाज, राजनीति, संस्कृति और तकनीक से जुड़े अनेक सवालों पर विचार-विमर्श हुआ। सम्मेलन का व्यापक संदेश यह रहा कि साहित्य केवल अपने समय का दस्तावेज नहीं है, बल्कि वह समाज की विसंगतियों को पहचानने, वंचित समुदायों के अनुभवों को अभिव्यक्ति देने और मानवीय स्वतंत्रता तथा विवेक के पक्ष में हस्तक्षेप करने का माध्यम भी है।
