छठ पर दिल्ली-चंडीगढ़ तक पहुंचेगा कोसी का सूप-दौरा, बलथी गांव के कारीगरों की बढ़ी मांग
सिमरीबख्तियारपुर (सहरसा)
लोक आस्था के महापर्व छठ को लेकर कोसी क्षेत्र में तैयारियां तेज हो गई हैं। बाजारों में छठ पूजा में इस्तेमाल होने वाली पूजन सामग्री की मांग बढ़ने लगी है।
वहीं, छठ पर्व में विशेष महत्व रखने वाले पारंपरिक सूप और दौरा की खरीदारी भी जोर पकड़ने लगी है। इस बीच सिमरीबख्तियारपुर प्रखंड के बलथी गांव में तैयार हो रहे सूप और दौरा की मांग अब कोसी क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गई है।
यहां बने सूप और दौरा से दिल्ली से लेकर चंडीगढ़ तक छठ पर्व की रौनक बढ़ेगी। महानगरों में रहने वाले कोसी क्षेत्र के लोगों के साथ अन्य ग्राहक भी यहां के पारंपरिक सूप और दौरा मंगा रहे हैं।
परिवार का हर सदस्य कर रहा काम
बलथी गांव का मल्लिक परिवार इन दिनों सूप और दौरा बनाने में पूरी तरह व्यस्त है। परिवार के सदस्य सुबह से देर रात तक इस काम में जुटे रहते हैं। छठ पर्व नजदीक आते ही परिवार की व्यस्तता बढ़ जाती है। घर के आंगन और आसपास के स्थानों पर सूप और दौरा तैयार करने का काम लगातार चल रहा है।
परिवार का हर सदस्य अपनी क्षमता के अनुसार इस काम में हाथ बंटा रहा है। कोई सूप तैयार करने में जुटा है तो कोई दौरा बनाने और उसे अंतिम रूप देने में लगा है। परिवार के सदस्यों का कहना है कि पर्व के अवसर पर मांग इतनी बढ़ जाती है कि समय पर आर्डर पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करनी पड़ती है।
कोसी से महानगरों तक पहुंच रही पारंपरिक कला
मल्लिक परिवार के सदस्यों ने बताया कि बलथी गांव में तैयार किए जा रहे सूप और दौरा की मांग अब दूसरे राज्यों तक पहुंच गई है। दिल्ली से लेकर चंडीगढ़ तक यहां निर्मित सामान भेजे जा रहे हैं। महानगरों में रहने वाले लोग छठ पर्व के अवसर पर अपने घरों और परिवारों के लिए कोसी में बने सूप और दौरा मंगवा रहे हैं।
खासकर बिहार और कोसी क्षेत्र से बाहर रहने वाले लोग छठ की परंपरा से जुड़े सामान को लेकर विशेष उत्साह दिखा रहे हैं। इससे गांव में तैयार होने वाले इन पारंपरिक सामानों को व्यापक बाजार मिल रहा है।
छठ में सूप और दौरा का है विशेष महत्व
छठ महापर्व में सूप और दौरा का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। सूर्योपासना के इस महापर्व में व्रती सूप में फल, ठेकुआ, नारियल और अन्य पूजन सामग्री सजाकर भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। वहीं, दौरा में पूजा की सामग्री और प्रसाद को रखकर घाट तक ले जाया जाता है।
छठ की पारंपरिक पूजा पद्धति में इन दोनों वस्तुओं का विशेष स्थान है। यही वजह है कि आधुनिकता के दौर में भी सूप और दौरा की मांग कम नहीं हुई है। बल्कि महानगरों में रहने वाले लोग भी छठ की पारंपरिक विधि और रीति-रिवाजों को पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं।
पुश्तैनी हुनर से परिवार को मिलता है रोजगार
बलथी गांव के मल्लिक परिवार के लिए सूप और दौरा बनाना केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि पुश्तैनी परंपरा और पारिवारिक हुनर का हिस्सा है। पीढ़ियों से इस काम से जुड़े परिवार के सदस्य छठ पर्व के मौसम में अपनी मेहनत के दम पर रोजगार का अवसर तैयार करते हैं।
पर्व के समय बढ़ने वाली मांग उनके लिए साल के सबसे महत्वपूर्ण व्यावसायिक अवसरों में से एक होती है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर उत्पादन करते हैं, ताकि स्थानीय बाजार के साथ-साथ दूसरे शहरों से आने वाले आर्डर भी पूरे किए जा सकें।
परंपरा को बचाने में जुटा है परिवार
बदलते समय और बाजार में तरह-तरह की आधुनिक वस्तुओं के आने के बावजूद छठ पर्व में पारंपरिक सूप और दौरा की अहमियत बरकरार है। बलथी गांव का मल्लिक परिवार अपने पुश्तैनी हुनर को जीवित रखते हुए इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है।
परिवार की मेहनत से तैयार सूप और दौरा जब दिल्ली और चंडीगढ़ जैसे महानगरों तक पहुंचते हैं तो इसके साथ कोसी की लोककला, संस्कृति और छठ की परंपरा भी दूर-दराज के शहरों तक पहुंचती है। यह गांव के कारीगरों के हुनर और मेहनत की पहचान के साथ-साथ कोसी की सांस्कृतिक विरासत के विस्तार की भी कहानी है।
